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Hindi Reetikavya Ka Vikas Aur Maharaja Mansingh ‘Dwijdev’ Ki Kavya Sadhna


ब्रजभाषा मुक्तक परम्परा के अद्वितीय कवि मानसिंह ‘द्विजदेव’ को उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भिक चरण के एक प्रमुख रीतिमुक्त कवि के रूप में मान्यता हासिल है। हिन्दी साहित्य के इतिहास में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल समेत अनेक विद्वानों ने इन्हें रीतिकाल के शृंगारी कवियों की परम्परा में रीतिमुक्त कविता का अन्तिम प्रसिद्ध कवि माना है। भाषा की प्रांजलता, बखान की सजीवता और भाव-व्यंजना की सूक्ष्मता के साथ द्विजदेव की कविता छप्पय, दोहा, सवैया, घनाक्षरी आदि विभिन्न छन्दों के माध्यम से प्रेम के अनन्य सनातनी प्रतीक राधा-माधव को अपनी कविता का विषय बनाती है। ऐसे भावमयी अलौकिक वर्णन के साथ द्विजदेव भक्ति में संयोग और विरह का अछोर निर्मित करते हैं। इस अध्ययनपरक ग्रन्थ को, ऐसे महाकवि के सन्दर्भ में रचा गया है, जिन्हें समकालीन अर्थों में देखने, समझने की नयी दृष्टि मिलती है। द्विजदेव की शृंगारिक कविता को काव्य-रसिकों के बीच पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से प्रणीत यह मनोहारी शोध रीतिकाल को समग्रता में देखने की कोशिश है। इस अध्ययन की गम्भीर अर्थ भंगिमा पूर्वज कवियों के प्रति लेखिका का साहित्यिक अर्थों में कृतज्ञता ज्ञापन है।

Rs.499.00

Author – Aparna Mishra
ISBN – 9789389563757
Lang. – Hindi
Pages – 278
Binding – Paperback

Weight .250 kg
Dimensions 8.57 × 5.51 × 1.57 in

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