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Ashtavakra Mahagita Vol. 7


युग बीते पर सत्य न बीता, सब हारा पर सत्य न हारा

महाशय को कैसा मोक्ष!
पतंजलि पूरे होते हैं समाधि पर; और अष्टावक्र की यात्रा ही शुरू होती है समाधि को छोड़ने से। जहां अंत आता है पतंजलि का वहीं प्रारंभ है अष्टावक्र का। अष्टावक्र आखिरी वक्तव्य हैं। इससे ऊपर कोई वक्तव्य कभी दिया नहीं गया। यह इस जगत की पाठशाला में आखिरी पाठ है। और जो अष्टावक्र को समझ ले, उसे फिर कुछ समझने को शेष नहीं रह जाता। उसने सब समझ लिया। और जो अष्टावक्र को समझ कर अनुभव भी कर ले, धन्यभागी है। वह तो फिर ब्रह्म में रम गया। ओशो

Rs.800.00

Chapter Titles

1: शुष्कपर्णवत जीओ
2: घन बरसे
3: महाशय को कैसा मोक्ष!
4: एकाकी रमता जोगी
5: जानो और जागो
6: अपनी बानी प्रेम की बानी
7: दृष्य से द्रष्टा में छलांग
8: मन तो मौसम सा चंचल
9: स्वातंत्र्यात्‌ परमं पदम्‌
10: दिल का दिवालय साफ करो

Weight .520 kg
Dimensions 8.66 × 7.25 × 1.57 in

AUTHOR: OSHO
PUBLISHER: Osho Media International
LANGUAGE: Hindi
ISBN: 9788172613747
PAGES: 300
COVER: HB
WEIGHT :520 GM

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