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ASHTAVAKRA MAHAGITA, VOL.2


युग बीते पर सत्य न बीता, सब हारा पर सत्य न हारा

‘दुख का मूल द्वैत, उसकी औषधि कोई नहीं।’ इससे तुम थोड़े चौंकोगे भी, घबड़ाओगे भी। क्योंकि तुम बीमार हो और औषधि की तलाश कर रहे हो। तुम उलझे हो और कोई सुलझाव चाहते हो। तुम परेशानी में हो, तुम कोई हल खोज रहे हो। तुम्हारे पास बड़ी समस्याएं हैं, तुम समाधान की तलाश कर रहे हो। इसलिए तुम मेरे पास आ गए हो। और अष्टावक्र की इस गीता में जनक का उदघोष है कि औषधि कोई नहीं! इसे समझना। यह बड़ा महत्वपूर्ण है। इससे महत्वपूर्ण कोई बात खोजनी मुश्किल है। और इसे तुमने समझ लिया तो औषधि मिल गई। औषधि कोई नहीं, यह समझ में आ गया, तो औषधि मिल गई। जनक यह कह रहे हैं कि बीमारी झूठी है। अब झूठी बीमारी का कोई इलाज होता है? झूठी बीमारी का इलाज करोगे तो और मुश्किल में पड़ोगे। झूठी बीमारी के लिए अगर दवाइयां लेने लगोगे, तो बीमारी तो झूठ थी; लेकिन दवाइयां नई बीमारियां पैदा कर देंगी। इसलिए पहले ठीक-ठीक निर्णय कर लेना जरूरी है कि बीमारी सच है या झूठ? ओशो

Rs.800.00

Chapter Titles

1: दुख का मूल द्वैत है

2: प्रभु-प्रसाद–परिपूर्ण प्रयत्न से

3: जब जागो तभी सवेरा

4: उद्देश्य–उसे जो भावे

5: जीवन की एकमात्र दीनता: वासना

6: धर्म है जीवन का गौरीशंकर

7: परीक्षा के गहन सोपान

8: विस्मय है द्वार प्रभु का

9: संन्यास का अनुशासन: सहजता

10: क्रांति: निजी और वैयक्तिक

Weight .560 kg
Dimensions 8.66 × 7.25 × 1.57 in

AUTHOR: OSHO
PUBLISHER: Osho Media International
LANGUAGE: Hindi
ISBN: 9788172613693
PAGES: 300
COVER: HB
WEIGHT :560 GM

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